सीमा के पार मां से मिला बिछड़ा लाल, भावुक हुआ माहौल
सुपौल/जोगबनी। कई दिनों से अपने घर-परिवार से दूर एक नेपाली नाबालिग बालक के लिए 18 अगस्त 2026 का दिन भावुक कर देने वाला रहा। कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया की लंबी कड़ी पूरी होने के बाद आखिरकार कृष्ण कुमार चौधरी अपनी मां तक पहुंच गया। भारत-नेपाल सीमा के जोगबनी बॉर्डर पर जब बालक को माईती नेपाल के सुपुर्द किया गया और बाद में नेपाल प्रहरी, रानी विराटनगर के माध्यम से उसकी मां श्रीमती लक्ष्मी चौधरी को सौंपा गया, तो मानो एक मां की लंबी प्रतीक्षा का अंत हो गया।
कृष्ण कुमार चौधरी नेपाल के विराटनगर, वार्ड संख्या 15, जिला मोरंग का रहने वाला है। बालक के संरक्षण, सामाजिक अन्वेषण और सुरक्षित घर वापसी की प्रक्रिया जिला बाल संरक्षण इकाई, सुपौल की पहल पर शुरू हुई थी।
जिला बाल संरक्षण इकाई, सुपौल के पत्रांक 1009, दिनांक 07.07.2026 के तहत जागरण कल्याण भारती, फारबिसगंज और माईती नेपाल, काठमांडू को संयुक्त रूप से बालक का सामाजिक अन्वेषण करने की जिम्मेदारी दी गई। बाल कल्याण समिति, सुपौल के निर्देशानुसार सामाजिक अन्वेषण के बाद बालक को उसके माता-पिता तक सुरक्षित पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
जागरण कल्याण भारती के अध्यक्ष संजय कुमार ने बताया कि सामाजिक अन्वेषण प्रतिवेदन प्रस्तुत किए जाने के बाद बिहार सरकार के समाज कल्याण निदेशालय, पटना और भारत सरकार के प्रयास से नेपाली राजदूतावास, नई दिल्ली के आदेश संख्या 082/83/CON 17.1/15620, दिनांक 15.07.2026 के आलोक में आवश्यक विधि-सम्मत कार्रवाई की गई।
इसके बाद जिला बाल संरक्षण इकाई, सुपौल के ज्ञापांक 1210, दिनांक 12.08.2026 के आदेश के आलोक में 18 अगस्त को दोपहर करीब 3:30 बजे बालक को निर्धारित प्रक्रिया के तहत माईती नेपाल की प्रतिनिधि श्रीमती गीतांजलि शर्मा को सौंपा गया। इस दौरान जागरण कल्याण भारती, फारबिसगंज के डीसी दीपक कुमार पासवान सहित संबंधित प्रतिनिधि मौजूद रहे।
इसके बाद बालक को सुरक्षित रूप से भारत-नेपाल सीमा के जोगबनी बॉर्डर तक पहुंचाया गया। वहां जागरण कल्याण भारती, फारबिसगंज के संगम लाल पासवान की मौजूदगी में बालक को माईती नेपाल के सुपुर्द किया गया।
सीमा पार करने के बाद नेपाल प्रहरी, रानी विराटनगर के माध्यम से कृष्ण कुमार को उसकी मां श्रीमती लक्ष्मी चौधरी के हवाले कर दिया गया। लंबे इंतजार के बाद मां और बेटे का मिलन हुआ। यह पल केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया का पूरा होना नहीं था, बल्कि एक बच्चे का अपने परिवार और मां की ममता की गोद में वापस लौटना था।
बाल संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं और दोनों देशों के संबंधित पक्षों के समन्वित प्रयास से नाबालिग की सुरक्षित घर वापसी संभव हो सकी। इस पूरी प्रक्रिया ने यह संदेश भी दिया कि सीमा भले ही दो देशों को अलग करती हो, लेकिन एक बच्चे और उसकी मां के बीच रिश्ते की डोर किसी सीमा की मोहताज नहीं होती।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें